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एक ही अन्ना काफी है !

Posted On: 8 Apr, 2011  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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जब मन की ना हो तो क्या !

Posted On: 4 Mar, 2011  
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शास्त्रों की रचयिता स्त्रियां होतीं तो….!

Posted On: 22 Feb, 2011  
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एक मजबूर आदमी की कथा

Posted On: 18 Feb, 2011  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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मीडिया के भगवा मौलाना

Posted On: 10 Feb, 2011  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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प्यार के द्वंद – Valentine Contest

Posted On: 7 Feb, 2011  
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राष्ट्रीय मर्म से अपरिचित “मीडिया” युवराज

Posted On: 3 Jan, 2011  
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क्या जागरण जंक्शन बन सकता है जनता की आवाज?

Posted On: 8 Jul, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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वत्स जी आपकी बात सही है की इसपर व्यापक बहस होनी ही चाहिए.. हमारा समाज विवाह को एक ऐसा अधर मानता है जिसे न सिर्फ स्त्री पुरुष बल्कि समाज की भी पवित्रता बनी रहती है ..विश्वाश की आधारशिला यही से पड़ती है .. आधुनिक भौतिकवादी व्यभिचारी वर्ग जिन्हें मै दो वर्गों में बांटता हु.. पुरुष वैश्या और महिला वेश्या.... जो भी ऐसे अनैतिक संबंधो की तरफदारी करते है . बिलकुल सही प्रश्न उठाया आपने.. कुत्ते बिल्लियों की तरह सड़क पर या कही भी पहले तो अपनी इच्छा पूर्ति करली और जब मन भर गया तो एक दुसरे को ही काटने दौड़ना और न कट पाए तो शोषण का आरोप लगाकर कानून और मिडिया के सामने आकर अपना दुखड़ा रोना.. ये कौन सा समाज है और ये किस तरह के प्राणी है मुझे भी समझ नहीं आता.. ये खुद जिस कीचड़ में रहते है उसी गटर में समाज को भी धकेलना चाहते है.. मामला तो व्यभिचार और स्वार्थ का ही होता है.. पर चुकी स्वार्थ की कोई सीमा नहीं होती और व्यभिचार की भी कोई सीमा नहीं होती.. इसीकारण शिकायत होती है... बेहतरीन लेख है इस विषय पर

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

राहुल गांधी हिन्दुओं के प्रति दुर्भावना से प्रेरित लगते हैं, वह अमेरिकी अधिकारी को बताना चाहते थे कि जो लोग अपने हिन्दू होने पर स्वाभिमान और गर्व से प्रेरित हों उन्हें कट्टरपंथी कहो और आतंकवादी मानो भले ही वह आतंकवादी न हों . इस्लाम को मानने वाले आतंकवादियों से कोई खतरा नहीं है. यह एक साम्प्रदायिक दृष्टिकोण लगता है . जब भारत की जनता बहुलता से हिन्दू है और इस्लाम एवं अन्य धर्मों को मानने वालों के प्रति सम्मान का भाव रखती है तब यह व्यक्ति क्यों बाहरी लोगों के से देश को बांटने वाली दृष्टि के साथ बात करता है और एक धर्म की तुलना में दूसरे धर्म को बुरा देखता है ? यह विचारणीय विषय है . हमें राहुल गांधी जैसे लोगों का पूरी ताकत के साथ विरोध करना चाहिए .

के द्वारा:

वत्स जी ..मुझे लगता है की जागरण जंक्शन अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह जनता है और इन मुद्दों को हमेशा से अपने पाठकों के समकक्ष प्रस्तुत करता रहा है. छाए वह प्रशासनिक और कानून से जुड़े मुद्दे हो, लड्कियों और महीलाओं पर समाज द्वारा किया जाने वाला शोषण, रेप और लिविंग रीलेसन जैसे समाजिक मुद्दे हो या फिर बाल शोषण और बाल श्रम जैसे राष्टीय आपदा. इसके अलावा नकसलवाद और आतंकवाद को जागरण मंच ने हमेशा उठाया. और सबसे अच्छी बात तो हमको हार एक सक्सन में कुछ न कुछ मिलेगा. मुझे जोन एक विश्व पढ़ना है वह है बिज़नेस अतः मेरी जागरण मंच से यह गुज़ारिश है की आप इस विषय पर ध्यान दे और हमारे पाठकों को बिज़नेस पर पड़ने के लिए ब्लाग दे.

के द्वारा:

चातक जी, टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार. आपके राष्ट्रवादी विचारों से मैं अवगत हूँ. आप जैसे लोग इस मंच सहित पूरे समाज के लिए अनमोल रत्न की भांति हैं. मैं चाहता हूँ कि जागरण जंक्शन ऐसी शुरुवात करे जहां पर पाठकनामा और साथ ही सिटीजन जर्नलिस्ट जैसी सुविधा एक साथ हो इससे हमें तमाम सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक समस्याओं को सभी के सामने लाने का अवसर प्राप्त होगा. साथ ही उन समस्याओं से लड़ने और समाधान तलाशने में भी मदद मिलेगी. जागरण जंक्शन को गंभीर मामलों को अपने अखबार दैनिक जागरण में भी प्रकाशित कर भ्रष्टाचार, कर्तव्य में लापरवाही तथा अपराध से निपटने की मुहिम को आगे बढ़ाना चाहिए.

के द्वारा: vats vats

चाचाजी टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार. मैं चाहता हूँ कि जागरण जंक्शन ऐसी शुरुवात करे जहां पर पाठकनामा और साथ ही सिटीजन जर्नलिस्ट जैसी सुविधा एक साथ हो इससे हमें तमाम सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक समस्याओं को सभी के सामने लाने का अवसर प्राप्त होगा. साथ ही उन समस्याओं से लड़ने और समाधान तलाशने में भी मदद मिलेगी. जागरण जंक्शन को गंभीर मामलों को अपने अखबार दैनिक जागरण में भी प्रकाशित कर भ्रष्टाचार, कर्तव्य में लापरवाही तथा अपराध से निपटने की मुहिम को आगे बढ़ाना चाहिए. चाचा जी, आप जैसे बुद्धिजीवियों और अन्य साथियों की मांग सुन कर जागरण जंक्शन को जरूरी रूप से ये व्यवस्था लागू करनी चाहिए.

के द्वारा: vats vats

मै आपकी बात से सहमत नहीं हु .. शायद आप उस पश्चिमी नारी मुक्ति विचारधारा से अपने विचार ले रही है .. जो पश्चिम के नारी मुक्ति आंदोलन से प्रभावित हैं वो ये मान बैठे हैं कि भारत और यूरोप में महिलाओं की स्थिति एक जैसी है। जबकि ऐसा है नहीं। यूरोप में महिला की स्थिति और उसका सामाजिक इतिहास तथा भारत में महिला की स्थिति और उसका इतिहास अलग-अलग रहा है। इसको बिना समझे जो कोशिशें होंगी वो महिला सशक्तिकरण या महिलाओं की समाज में सहभागिता या सत्ता, संपत्ति और सम्मान में उनकी हिस्सेदारी की दिशा में फलप्रद नहीं होगी। ये परिवार जैसी संस्था ही है की हमारे देश में मनोवैज्ञानिक समस्याए जो आजतक दूर दूर कही सुनने में आती थी.... क्योकि पारिवारिक जीवन में लोग शांत और सुकून से अपने अपने कार्यो का निर्वाह करते थे... जबकि पश्चिमी देशो में मनोवैज्ञानिक समस्याए.. भारत के मुकाबले २० गुना ज्यादा है ..वजह साफ़ है व्यक्तिवाद हावी है और स्त्री पुरुष के कार्य अधिकार ,, सबका आधार आर्थिक और भौतिक अर्जन की क्षमता से लिया जाता है .. जबकि भारतीय परिवेश मशीनी नहीं है ...परिवार जैसी वैज्ञानिक और शक्तिशाली संस्था को आपने ऐसी टिप्पड़ी की मनो वह जेलखाना हो नारी के लिए... क्या आपने अपनी माता जी से पुचा कभी की किन कठिनाइयों लगन और जिम्मेदारी से उन्होंने आपको पाला और आज आप अपनी एक पहचान बना कर बैठी है तो क्या आपकी माता जी ने जीवन भर कोई काम ही नहीं किया आपने कितनी आसानी से कह दिया की किस परिवार की बात आप कर रहे है ...?किसी और की नहीं अपने ही परिवार की बात कर रहा हु ...जहा हर निर्णय लेने में घर की महिला सदस्य की सहमती अनिवार्य होती है ..वही परिवार जो एक ढाचे को घर बनता है .... हम होटलों वाली संस्कृति में नहीं रह सकते .. आपको परिवार की अहमियत का अंदाज़ा अभी नहीं हो रहा है ....पर अगर भारतीय समाज का गहरी से अध्ययन करे तो आप यकीं नहीं करेंगी... तमाम समकालीन सभ्यताओ के मिटटी में मिल जाने के बाद भी अगर भारतीय समाज पूरी शक्ति के साथ खड़ा है तो उसकी वजह ये परिवार नामकी संस्था ही है .... मै न तो नारी मुक्ति का विरोधी हु न ही नारी शशक्तिकरण का .. पर सवाल ये है की मुक्ति किस्से? शशक्तिकरण कैसे? और किस कीमत पर ... क्या नारी को पुरुष के बराबर लाने के लिए केवल आर्थिक या भौतिक संसाधन प् लेना ही लक्ष्य है ?.. ... क्या उसे सामाजिक पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त कर देने से वह शाशाक्त हो जाएगी? क्या पुरुषो ने परिवार में कोई सकारात्मक भूमिका नहीं निभाई है ... ?क्यों कुछ गिने चुने अनुभवों के आधार पर आपलोग पुरे पुरुष समाज को नारी का शोषक बना कर प्रचारित कर रहे है ? और नारी को किसी के टुकड़ो की जरुरत नहीं थी न है न होगी... वह अपना अधिकार लेने में स्वयं सक्षम है , और अपनी जिम्मेदारियों के प्रति पूरी तरह समर्पित भी.. ऐसे बाजारी विचारो से भारतीय नारी पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा.... हा उसके शशक्तिकरण की बात जहा तक है वह होना चाहिए और हो भी रहा है ..

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महोदय आपकी बात सही है. पुरुषों ने शुरु से ही महिलाओं के हक को दबाया है, लेकिन इसकी पीछे वजह है खुद महिलाओं का ऐसी परिस्थिति पैदा करना, स्त्री जो अपने आपमें ममता और प्रेम की देवी है वह काली का रुप भी है. सच है कि स्त्री से ही घत्र बनता है लेकिन यह स्त्री व्यवहार ही है जिसकी वजह से घर टुटते भी है. इतिहास हो या वर्तमान यह बात साबित है कि स्त्री ने अपने वासना के मोह से पोरुषो को मोहित कर कई बडे बदलाव किए जिनकी सजा समाज ने भुगती हैं. लेकिन यह भी सच है कि अगर स्त्री अपनी मर्यादा में रहे तो घर घर नही विश्व बन जाता है. उसके स्पर्श के बिना घर सजता नही . और हां बदलाव के दौर मे6 स्त्री का बाहर काम करना उसकी क्षमता दर्शाता हैकि वह कमजोर नही है. लेकिन क्या स्त्री के नाम पर अन्य समाज में स्त्रियों की प्रतिष्टा को ठेस पहुचां रही है , और लोग कहने को मजबूर है कि स्त्री का मन वायु का भांत्यि होता है. जो फतवा देवबंद ने जारी किया उसके पीछे का सच जानना बडा मुश्किल है . . साफ है कि जब तक स्त्री अपनी सीमा और मर्यादा में रहे तब तक वह पूज्यनीय है ,अथवा वह स्त्री के होने का फायदा उठाएगी. लेकिन महिलाओं के आने से पुरुषों का घबराना यह दर्शाता है कि पुरुष किस कदर विवेकहीन है. अगर विकास चाहिए तो दोनो को मिलकर साथ चलना चाहिए और एक दुसरे से जलने की बजाय एक बेहतर समाज का निर्माण करना चाहिए.

के द्वारा:

निखिल जी, प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद. नारी को ज़रा उसका सही स्थान देके तो देखिए. तब पता चलेगा किनारी पुरुषों के विकास में कितनी उपयोगी है. अभी तो जो भी दिया गया एक दया के तहत. किस परिवार की बात करते है आप. परिवार के नाम पर अत्याचार का अच्छा माध्यम ढूंढ निकाला है आप लोगों ने. जब आप लोग नारी को कोई सुविधा देते हैं तो कितनी दया होती है उस देने में. जबकि ऐसा बिलकुल नहीं होना चाहिए. आज तक जितने भी सुधार नारियों के नाम पर हुए सब में दृष्टिकोण एक ही रहा कि ये तो अबला बेचारी, खुद का भला कर नहीं सकती इसलिए किसी ना किसी को इस पर अनुग्रह करना ही पडेगा,. आप जैसे पुरुषों की जमात ने जब चाहे उसे यूज किया जब चाहे फेंक दिया. अब भारत की नारी जाग्रत हो चुकी है उसे किसी के अवलंबन की जरूरत नहीं.

के द्वारा:

आपकी सारी बाते व्यर्थ प्रलाप से ज्यादा कुछ नहीं..है अगर आपको ये लगता है की पुरुष मात्र राक्षसी प्रवृत्ति का जीव है तो फिर आपको भारतीय दर्शन की जानकारी नहीं है , भारतीय शाश्त्र पुरुषो द्वारा रचे नहीं गए उनमे स्त्रियों का भी योगदान है ..आपको पता होना चाहिए .और स्त्री कभी पुरुष के लिए खतरा नहीं रही है हा आप लोगो ने चिल्ला चिल्ला कर पुरुषो को जरुर महिलाओ के लिए खतरा बना दिया है ...वजह ये ही है की आपने एक दो बुरे अनुभव देखे सुने और मान लिया की सारी महिलाये पुरुषो द्वारा प्रताड़ित है ...आपकी ये बाते बेहद हास्यास्पद भाषण लग रही है जैसा अक्सर महिला मोर्चो में नारी शासह्क्तिकरण की अगुआ महिलाये बोलती है. ये केवल आपकी और आप जैसे कुछ प्रचार के भूखे लोगो की मानसिकता है आपसबको हर जगह केवल कष्ट तकलीफ शोषण , ही दीखता है अगर कोई चैन से अपना जीवन बिता रहा हो तो भी आप उसके शारीर को कुरेद कुरेद कर कह्नेगे की तुम दुखी हो , शोषित हो ..आपको भारत के इतिहास भारत के समाज और इस समाज में परिवार रुपी संस्था की मजबूती और उसमे स्त्री पुरुष के बराबर और एकदूसरे के पूरक रूप में किये गए योगदान की जानकारी नहीं है ...आप जिस नारी क्रांति का ढिंढोरा पीट रही है वो भारत की नारी को पहले से ही प्राप्त है आज की भारतीय नारी आपके आंकलन के हिसाब से नहीं है ..वह मजबूत थी है और रहेगी.... आपलोगों की समस्या ये है की आपको भारत का शांत पारिवारिक ढाचा रास नहीं आता .. आप चाहते है की परिवार खतम्म हो जाये और वह व्यवस्था कायम हो जाये जिसमे स्त्री पुरुष मात्र सेक्स मशीने रहे उनसे जो संतान पैदा हो वह राज्य की संपत्ति हो और राज्य उनकी देख रेख करे ... स्त्री पुरुष स्वक्षंद आचरण करे ....कोई बंधन न हो... क्या ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाना चाहती है आप...? पर जरा सोचिये ऐसी व्यवस्था में क्या रिश्ते नाते आपसी सम्बन्ध और आत्मीयता जैसे शब्द मिलेंगे ? और एक बात समझ लीजिये अगर परिवार टूट गए तो भावनाए अराजक मर्यादाहीन और गैर जिम्मेदार हो जाएँगी... भारत और पश्चिमी देशो की जरूरते उनका रहन सहन अलग है.... हमें आधुनिकीकरण करना है न की पश्चिमीकरण ... समस्याए हर समाज में होती है .. भारत में भी है भारत में नारी की स्थिति पुरुषो से कमजोर है और कई जगह उन्हें समस्यायों का सामना करना पड़ता है पर स्थिति में धीरे धीरे सुधार आ रहा है और स्थिति सुधरेगी... अगर आप वास्तव में महिलाओ और भारत की शुभचिंतक है तो व्यवस्था में सुधार के लिए प्रयास करे..ऐसे भड़काऊ और पुरुष विरोधी प्रलाप से आप हसी की पत्र ही बनेंगी ..... क्योकि आपके विचारो से स्वयं भारत की करोणों महिलाये ही सहमत नहीं होंगी.... स्त्री को मजबूत कीजिये मगर उसे पुरुष का प्रतिद्वंदी मत बनाइये क्योकि दोनों एक दुसरे के पूरक है . महिलाओ को जागृत कीजिये उन्हें भडकाइये मत ...समाज के लिए दोनों बराबर जिम्मेदार और महत्वपूर्ण है उन्हें सहयोगी बनाइये... न की एक दुसरे के लिए खतरा......... एक अनुरोध

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

चूहे की तस्वीर के पीछे आपने अपनी पहचान तक छुपा रखी है मैय्या, छुप-छुप के नारी क्रांति का बिगुल फूंकेगी क्या. अगर आप वही नारी हैं जिसने सारी इंसानियत का सृजन किया है तो माता आपका अंदाज़े-बयां ही इतना शालीनता भरा है कि आपकी सृजित इंसानियत कितनी शालीनता भरी होगी इसका अंदाज़ा कोई भी लगा सकता है बस आपके ब्लॉग को पढ़ने की देर है . आपकी शालीनता और इंसानियत जैसे शब्दों का प्रयोग करने के अंदाज़ को मेरा प्रणाम . अगर आप नया नारी साहित्य या धर्म शास्त्र लिखें तो मेरी एक गुजारिश पर गौर फरमाइएगा - ऐसी बानी बोलिए मन का आप खोय, औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय अब ये न कहियेगा कि एक पुरुष द्वारा लिखी और एक पुरुष द्वारा की गई गुजारिश नाकाबिले-बर्दाश्त है.

के द्वारा: chaatak chaatak

बात भोतिक लाभ लेने की नहीं है.बात hai सोच की 'इंसान को sudarne से पहले उसकी सोच को सुधारो ,अगर देश के संसद का हाल सुधर गया देश अपने आप सुधर जायेगा, अगर छोटे रूप में देखते है की अगर प्रिंसिपल तेज हो तो teechar को हर हाल. में padhana होता है.अगर प्रिंसिपल कहदे मुघे इतना रिजल्ट चाहिए तो चाहिए;तब टीचर हर हाल में पढ़ाते है,ठीक उसी प्रकार प्रधान मंत्री सांसदों से एक ओउत्पुत मान सकता है अगर संसद के ऊपर डंडा होगा तो बो जरूर विकाश कराएगा,ठीक उसी प्रकार मुख्या मंत्री विधायको से ,विधायक नगर पालिका अध्यक्ष से ,नगर पालिका अध्यक्ष पर्सदो पर प्रेस्सुरे डाले तथा एक निश्चित समय पर कार्य प्रगति मांगे तो देश का विकाश होगा,इस देश की यह नियति बन चुकी है की "बिना डंडे के कोई काम नहीं करता और डंडे के साथ कोई काम नहीं रुकता"

के द्वारा: shubham deolia shubham deolia




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